महाभारतकालीन इस मंदिर में मुर्दे भी हो जाते हैं जिंदा, विश्वास नहीं होता तो देख लें

महाभारतकालीन इस मंदिर में मुर्दे भी हो जाते हैं जिंदा, विश्वास नहीं होता तो देख लें

महाभारतकालीन इस मंदिर में मुर्दे भी हो जाते हैं जिंदा, विश्वास नहीं होता तो देख लें

इस दुनिया में चमत्कारों की कमी नही है. और भारत देश तो वह देश है. जिसने अनेको अनेक चमत्कारी स्थान तंत्र मन्त्र यंत्र और विद्याओ को हजारो साल पहले ही अविष्कार कर लिया था.

अनेक चीजे और तथ्य ऐसे होते है, जिन पर आसानी से विश्वास नही किया जा सकता. लेकिन सम्बंधित तथ्य की पूरी जानकारी प्राप्त करने और देखने के बाद मानना ही पड़ता है.

इसी सन्दर्भ में हम आप को भारत के उस चमत्कारिक और रहस्मयी मंदिर के बारे में बताने जा रहें हैं. जहां जाने के बाद मुर्दे भी जिंदा हो जाते हैं. जैसे ही किसी शव को इस मंदिर में ले जाया जाता है, उसकी आत्मा उस शव में पुन: प्रवेश कर जाती है और वह इंसान एक बार फिर जिंदा हो उठता है.

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भारत के उत्तरांचल राज्य की राजधानी देहरादून से मात्र 128 किमी दूर लाखामंडल नामक स्थान पर यह मंदिर स्थित है. यमुना नदी तट पर बर्नीगाड़ नामक जगह केवल 4—5 किमी दूर यह मंदिर स्थित है.

कहा जाता है कि मुख्य शिवलिंग सृष्टि की रचना के समय से यहां मौजूद है और इस पर जलाभिषेक से भगवान शिव अपने भक्त के समस्त पापों का नाश कर देते है। जलाभिषेक के समय भक्त का चेहरा शिवलिंग में स्पष्ट नजर आता है। इस शिवलिंग के प्रति आस्था कितनी गहरी है इसका अन्दाजा इस मान्यता से लगाया जा सकता है कि यहां स्थापित द्वारपालों के सामने किसी शव का रखकर पुजारी उस मन्दिर का पवित्र जल छिड़के तो वह कुछ समय के लिए ​जीवित हो उठता है। जीवित होने पर वह भगवान का नाम लेता है। उसे गंगाजल दिया जाता है तथा गंगाजल ग्रहण करने के बाद व्यक्ति इस संसार को छोड़ देता है।

पहला शिवलिंग है यह! 

कहा जाता है कि एक बार भगवान ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता को लेकर विवाद हो गया। दोनों में यह बहस छिड़ गई कि कौन सबसे श्रेष्ठ है। उनके इस विवाद के दौरान एक घटना घटित हुई। एक अग्नि पिंड उनके बीच में आकर स्थित हो जाता है। दोनों इसकी शुरूआत और अंत खोजने लगते है लेकिन, वे इसमें सफल नहीं हो पाते। इसमें से ॐ की ध्वनि आ रही थी। ब्रह्मा जी और विष्णु जी समझ गए कि यह शक्ति है और वे स्वयं ॐ की आराधना करने लगे। उनकी आराधना से शिव प्रसन्न हुए और उन्हें वरदान देकर अंतर्ध्यान हो गए। लिंग महापुराण के अनुसार यह भगवान शिव का पहला शिवलिंग था। इस लिंग के स्थापित होने के बाद स्वयं भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी ने शिवलिंग की पूजा की थी। यह वहीं शिवलिंग है जिसकी पूजा आज लाखामंडल में होती है।

कलियुग में ऐसे प्रकट हुआ यह शिवलिंग

इस अनोखे शिवलिंग के प्रकट होने के संबंध में कहा जाता है कि लाखामंडल के किसी व्यक्ति को स्वप्न में एक साधु यह कहते नजर आया कि वह दलदल मे फंसा है और उसे निकाल ले। व्यक्ति सपने में दिखी जगह पहुंचा और उसने अन्य लोगों की मदद से खुदाई की तो वहां यह शिवलिंग नजर आया। बाद में गुप्तोत्तर काल में सातवीं शताब्दी में सिंहपुर के यदुवंशीय शासक श्रीभास्कर वर्मन की पुत्री ईश्वरा ने अपने पति श्रीचन्द्र गुप्त (जालंधर का शासक) की पुण्य स्मृति में लाखा मंडल में शिव मंदिर का निर्माण कराया था। ऐतिहासिक मंदिर के परिसर से दो शिला लेख प्राप्त हुए हैं। इसी तरह यहां दो गुफाओं मे रखी हुयी शिला पर लिखी एक भाषा का रहस्य आज तक बना हुआ है।

यहां और भी शिवलिंग है

यहां पर और भी कई छोटे—बड़े शिवलिंग है। यह सब यहां खुदाई में मिले है। यहां एक मान्यता और है। इसके अनुसार महाभारत काल में पांडवों को जीवित आग में भस्म करने के लिए कौरवों ने यहीं लाक्षागृह का निर्माण करवाया था। अज्ञातवास के दौरान इस स्थान पर स्वयं युधिष्ठिर ने शिवलिंग को स्थापित किया था। इस शिवलिंग को महामंडेश्वर नाम से जाना जाता है। जहां युधिष्ठिर ने शिवलिंग स्थापित किया था वहां एक बहुत खूबसूरत मंदिर बनाया गया था। शिवलिंग के ठीक सामने दो द्वारपाल पश्चिम की तरफ मुंह करके खड़े हुए दिखते हैं।
महामंडलेश्वर शिवलिंग के बारे में यह भी मान्यता है कि जो भी स्त्री, पुत्र प्राप्ति के उद्देश्य से महाशिवरात्रि की रात मंदिर के मुख्य द्वार पर बैठकर शिवालय के दीपक को एकटक निहारते हुए शिवमंत्र का जाप करती है, उसे एक साल के भीतर पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है। यहां अखंड ज्योत जलती है।

NEXT कर आगे दर्शन करें उस अद्भुत शिवलिंग के 

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